दैनिक रुड़की (रियाज कुरैशी)::
रुड़की। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की के ताज़ा शोध ने हिमालयी क्षेत्र की मौसम प्रणालियों में उभरते जलवायु संकेतों का खुलासा करते हुए पश्चिमी विक्षोभों के बदलते स्वरूप पर गंभीर चिंता जताई है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ क्लाइमेटोलॉजी में प्रकाशित इस अध्ययन में पाया गया कि पारंपरिक रूप से शीतकालीन हिमपात से जुड़े पश्चिमी विक्षोभ अब प्री-मानसून अवधि में भी अधिक सक्रिय हो रहे हैं, जिससे वर्षा के मौसमी संतुलन में परिवर्तन आ रहा है।
शोध के अनुसार जलवायु ऊष्मायन के प्रभाव से ये मौसम प्रणालियाँ लंबी दूरी तय कर अधिक नमी एकत्रित कर रही हैं, जिसके कारण मार्च से मई के बीच वर्षा में वृद्धि देखी जा रही है। इससे हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी में अचानक बाढ़, भूस्खलन और अत्यधिक वर्षा जैसी आपदाओं का जोखिम बढ़ सकता है, साथ ही निचले क्षेत्रों में जल उपलब्धता भी प्रभावित हो सकती है।
सात दशकों से अधिक के वायुमंडलीय और वर्षा संबंधी आंकड़ों के विश्लेषण में शोधकर्ताओं ने पश्चिमी विक्षोभों के मार्ग, संरचना और व्यवहार में स्पष्ट बदलाव दर्ज किए हैं। इनमें तेज ऊपरी हवाएँ, अधिक नमी अवशोषण और पारंपरिक शीतकालीन अवधि से बाहर भी वर्षा की तीव्रता शामिल है।
जल विज्ञान विभाग की पीएचडी शोधार्थी स्पंदिता मित्रा ने कहा कि अनियमित वर्षा और अचानक चरम मौसम घटनाएँ इन व्यापक वायुमंडलीय परिवर्तनों को दर्शाती हैं। उन्होंने 2023 की हिमाचल बाढ़ और 2025 की उत्तराखंड बाढ़ को ऐसे बढ़ते प्रभावों का उदाहरण बताया।
प्रधान अन्वेषक प्रो. अंकित अग्रवाल ने कहा कि पश्चिमी विक्षोभों में हो रहे मौसमी और संरचनात्मक परिवर्तन जल संसाधनों, आपदा जोखिम और क्षेत्रीय संवेदनशीलता पर दूरगामी असर डाल सकते हैं। वहीं, आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रो. के.के. पंत ने वैज्ञानिक निष्कर्षों को नीति निर्माण और आपदा तैयारी से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया।
अध्ययन हिमालयी राज्यों के लिए जलवायु मॉडल, पूर्वानुमान तंत्र और आपदा प्रबंधन रणनीतियों की पुनर्समीक्षा की तात्कालिक जरूरत को रेखांकित करता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि बदलते मौसम पैटर्न से निपटने के लिए विज्ञान, शासन और अवसंरचना के बीच समन्वित प्रयास आवश्यक होंगे, ताकि संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में जीवन, आजीविका और पारिस्थितिकी तंत्र सुरक्षित रह सकें।
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