News

30-05-2026 18:08:26

रुड़की, मंगलौर और कलियर से जुड़ी रहीं पद्मश्री बशीर बद्र की यादें,अफजल मंगलौरी ने साझा किए संस्मरण..

दैनिक रुड़की (रियाज कुरैशी)::


रुड़की। उर्दू ग़ज़ल को देश-दुनिया में नई पहचान दिलाने वाले प्रख्यात शायर डॉ. बशीर बद्र के भोपाल में निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर है। उनके निधन पर देश-विदेश से श्रद्धांजलियां दी जा रही हैं। उत्तराखंड के रुड़की, मंगलौर, पिरान कलियर, हरिद्वार और देहरादून से उनका विशेष लगाव रहा, जहां उन्होंने अनेक बार अपनी शायरी से लोगों के दिलों को छुआ था।


उत्तराखंड उर्दू अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष एवं अंतरराष्ट्रीय शायर अफजल मंगलौरी ने डॉ. बशीर बद्र से जुड़ी पुरानी यादों को साझा करते हुए बताया कि जब बशीर बद्र मेरठ विश्वविद्यालय में उर्दू विभाग के अध्यक्ष थे, तब वह बीएम डिग्री कॉलेज रुड़की के छात्र थे और अंतर विश्वविद्यालय काव्य प्रतियोगिताओं में भाग लेने मेरठ जाया करते थे। उन प्रतियोगिताओं में डॉ. बशीर बद्र और डॉ. कुँवर बेचैन जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकार निर्णायक की भूमिका निभाते थे।


अफजल मंगलौरी ने बताया कि वर्ष 1987 में मेरठ के सांप्रदायिक दंगों के दौरान डॉ. बशीर बद्र का घर जला दिया गया था। इस घटना ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया था। इसी दर्द से उनकी कई प्रसिद्ध ग़ज़लें जन्मीं। उनका मशहूर शेर—

"लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,

तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।"

आज भी लोगों की जुबान पर है।

उन्होंने बताया कि दंगों और पारिवारिक परिस्थितियों से दुखी होकर बशीर बद्र ने मेरठ छोड़ने का फैसला किया और बाद में भोपाल जाकर बस गए। इसी दौरान वर्ष 1988 में अफजल मंगलौरी ने उन्हें रुड़की आने का निमंत्रण दिया, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया।26 जून 1988 को रुड़की नगर पालिका सभागार में "एक शाम बशीर बद्र के नाम" कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया गया। समारोह में इलाहाबाद हाईकोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश जस्टिस एस.आई. जाफरी और तत्कालीन केंद्रीय पेट्रोलियम एवं गैस राज्य मंत्री रफीक आलम ने विशेष रूप से भाग लिया तथा डॉ. बशीर बद्र को राष्ट्रीय एकता सम्मान से सम्मानित किया गया।

रुड़की प्रवास के दौरान वह लगभग दस दिनों तक शहर में रहे और इस दौरान हरिद्वार, पिरान कलियर तथा मंगलौर में कई साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में शामिल हुए। मंगलौर में तत्कालीन कैबिनेट मंत्री काजी मोहिउद्दीन के निवास पर भी उनका लंबे समय तक प्रवास रहा, जहां शायरी की महफिलें सजती रहीं।अफजल मंगलौरी के अनुसार बाद के वर्षों में भी डॉ. बशीर बद्र कई बार रुड़की, हरिद्वार, मंगलौर और देहरादून आए। बीएसएम डिग्री कॉलेज में आयोजित एक बड़े मुशायरे में भी उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इसके अलावा सोलानीपुरम स्थित पूर्व कुलपति प्रो. वहीदुद्दीन मलिक और पूर्व जनसंपर्क अधिकारी मधुर जी के निवास पर भी कई बार साहित्यिक गोष्ठियों में शामिल हुए।

उन्होंने बताया कि वर्ष 2000 में दोहा, कतर और दुबई में आयोजित "जश्न-ए-बशीर बद्र" कार्यक्रमों में भी उन्हें आमंत्रित किया गया था, जहां उत्तरांचल राज्य गठन पर बशीर बद्र ने उन्हें विशेष रूप से बधाई दी थी।डॉ. बशीर बद्र के निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए अफजल मंगलौरी ने कहा कि उर्दू साहित्य ने अपना एक चमकता सितारा खो दिया है। उन्होंने कहा कि बशीर बद्र केवल एक शायर नहीं थे, बल्कि मोहब्बत, इंसानियत और सांप्रदायिक सौहार्द की आवाज थे। उनकी शायरी आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करती रहेगी।

उन्होंने कहा कि रुड़की, मंगलौर, कलियर और हरिद्वार की साहित्यिक दुनिया में डॉ. बशीर बद्र की यादें हमेशा जीवित रहेंगी और उनकी ग़ज़लें साहित्य प्रेमियों के दिलों में हमेशा गूंजती रहेंगी।

Dainik Roorkee
Get In Touch

Roorkee

+91-9917800802 | 9837404445 | 9897757557

dainikroorkeenews@gmail.com

Follow Us

© Dainik Roorkee. All Rights Reserved. Design by Xcoders Technologies