
दैनिक रुड़की (राहुल सक्सेना)::
रुड़की। कुमाऊं की समृद्ध लोक परंपरा और धार्मिक आस्था से जुड़ा प्रसिद्ध गौरा-महेश्वर (गौरा-मैसर) यानी सातूं-आठूं पर्व इस बार भी रुड़की में उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। अशोक नगर (ढंडेरा) स्थित कुमाऊं संस्कृति विकास मंडल समिति अशोक नगर की ओर से पर्व को लेकर तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। मंडल के अध्यक्ष विजय सिंह बानी ने बताया कि पारंपरिक ‘खेल’ कार्यक्रम की तैयारियां करीब 15 दिन पहले से ही शुरू हो जाती हैं।
उन्होंने बताया कि कुमाऊंनी समाज में सातूं-आठूं पर्व का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। पर्व की शुरुआत बीरूड़ पंचमी से होती है। इसमें परंपरानुसार विभिन्न प्रकार के अनाज और दालों को भिगोकर बीरूड़ तैयार किए जाते हैं। महिलाएं 2 दिन व्रत रखती है इसके बाद पूजा-अर्चना और पारंपरिक लोकगीतों का दौर शुरू होता है।

विजय सिंह बानी ने बताया कि पर्व के दौरान महिला और पुरुष पारंपरिक वेशभूषा में सजकर गोल घेरा बनाकर झोड़ा, चाचरी और अन्य लोक विधाओं के माध्यम से ‘खेल’ करते हैं। लोकगीतों और नृत्य के माध्यम से भगवान शिव और माता गौरा के विवाह, उनके पारिवारिक जीवन तथा कुमाऊं की लोक परंपराओं को जीवंत किया जाता है।


उन्होंने कहा कि आधुनिकता के दौर में भी इस परंपरा को जीवित रखना बेहद जरूरी है, ताकि नई पीढ़ी अपनी संस्कृति और जड़ों से जुड़ी रहे।मंडल अध्यक्ष के अनुसार पर्व के अंतिम चरण में 19 और 20 अगस्त को माता गौरा की विशेष पूजा-अर्चना के बाद उन्हें भावुक माहौल में विदाई दी जाएगी। इस दौरान पारंपरिक लोकगीतों के बीच गौरा को मायके से ससुराल के लिए विदा करने की परंपरा निभाई जाएगी।

उन्होंने कहा कि रुड़की में आयोजित यह पर्व कुमाऊं समाज के लोगों को अपनी लोक संस्कृति, परंपराओं और धार्मिक आस्था से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम है। कार्यक्रम में समाज के बड़ी संख्या में लोगों के शामिल होने की उम्मीद है।विजय सिंह बानी ने कुमाऊं समाज के लोगों को सातूं-आठूं पर्व की शुभकामनाएं देते हुए सभी से परंपराओं को आगे बढ़ाने और नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ने का आह्वान किया।
© Dainik Roorkee. All Rights Reserved. Design by Xcoders Technologies