दैनिक रुड़की (फिरोज खान)::
मंगलौर। राजकीय महाविद्यालय मंगलौर मे शनिवार को हिंदी विभाग के अंतर्गत “हिंदी साहित्य के बदलते सरोकार एवं मूल्य” विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिवस का शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर संगोष्ठी संयोजक डॉ0 राम भरोसे ने कहा कि यह संगोष्ठी भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली द्वारा प्रायोजित रही। संगोष्ठी के दूसरे दिवस के मुख्य अतिथि महाराष्ट्र से प्रो० सतप्पा चव्हाण, मुख्य वक्ता ऋषिकेश परिसर से प्रो0 कल्पना पंत, मुख्य वक्ता दिल्ली विश्वविद्यालय से प्रो0 मुन्ना पाण्डेय, मुख्य वक्ता जेएनयू प्रो0 मलखान सिंह, विशिष्ट वक्ता युवा फिल्म समीक्षक तेजस पूनियां और संरक्षक प्राचार्य प्रो० प्रेमलता कुमारी रही। दूसरे दिवस का शुभारंभ बीए तृतीय वर्ष की छात्रा भारती द्वारा आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर महिषासुरमर्दिनी स्त्रोत्र से हुआ।
आज इस संगोष्ठी के दूसरे दिन अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस धूमधाम से मनाया गया। इस दौरान मुख्य वक्ता मुन्ना पांडेय और विशिष्ट वक्ता तेजस पूनियां ने विचारधारा और सिनेमा विषय पर चर्चा की। संगोष्ठी की इस चर्चा में मुख्य वक्ता मलखान सिंह भी उपस्थित रहे। मुन्ना पांडेय, मलखान सिंह, तेजस पूनियां की सिनेमा पर इस चर्चा ने संगोष्ठी में महफिल लूटी। युवा समीक्षक तेजस पूनियां ने कहा कि दादा साहब फाल्के द्वारा शुरू किए गए सिनेमा में चमत्कार, धार्मिक कहानियां थीं तो उसके बाद सिनेमा बदलने लगा गांधी, नेहरूवाद से होते हुए सिनेमा ने यथार्थ की राह पकड़ी।
मुन्ना पांडेय ने कहा कि सिनेमा में विचारधाओं का आगमन सहज रूप से होता आया है। विचारधाराएं हमारे मानव मस्तिष्क में सिनेमा के माध्यम से संपुट होती आई हैं। उन्होंने नेहरूवाद व गांधीवाद पर बात रखते हुए अम्बेडकर की विचारधारा को सिनेमा से अछूता रखने की बात भी उठाई। इस अवसर पर महाविद्यालय के बीए प्रथम और तृतीय वर्ष के छात्र भारती, प्रिया त्यागी और पुनित कुमार ने संगोष्ठी की संपादित पुस्तकों हिन्दी साहित्य के बदलते सरोकार एवं मूल्य' व 'हिन्दी साहित्य में सन्निहित मूल्य' में प्रकाशित लेख और कविताओं का वाचन भी किया गया। संगोष्ठी के दूसरे तकनीकी सत्र में राजकीय महाविद्यालय खानपुर के हिन्दी विभाग प्रभारी डॉ0 रेणु देवी की पुस्तक 'ममता कालिया का कथा साहित्य और जीवन मूल्य' का लोकार्पण भी मुख्य अतिथियों द्वारा किया गया।
संगोष्ठी में डॉ. आरती प्रजापति ने अपना शोधपत्र हिंदी साहित्य का इतिहास और मध्यकालीन कवयित्रियां विषय से प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि स्त्री लेखन की परम्परा वैदिक काल से शुरू हुई। ऋग्वेद के कई सूक्त की रचना स्त्रियों द्वारा की गई है। वैदिक काल के बाद भी यह परम्परा लगातार जारी रही है। मुख्य वक्ता डॉ. रक्षा गीता दिल्ली यूनिवर्सिटी ने अपने ऑनलाइन वक्तव्य में कहा कि सवर्ण मानसिकता से ओतप्रोत हिंदी सिनेमा ने बाबा साहब अम्बेडकर के विचारों को अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार किया लेकिन उन्हें श्रेय नहीं दिया।
जबकि आज हाशिये का समाज फिल्म निर्माण के क्षेत्र में आ रहा है और सफल भी हो रहा है। सिनेमा लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा है और पॉपुलर कल्चर ‘मास’ के सहारे आगे बढ़ता है आज का शिक्षित दलित अम्बेडकरवादी ‘मास’ अंबेडकर को सिनेमा में देखना चाहता है तो सिनेमा इसे नजरअंदाज नहीं कर सकता क्योंकि इन फिल्मों की बॉक्स ऑफिस सफलता ने सिद्ध कर दिया है कि दलित अंबेडकर विचारधारा को सिनेमा में जगह देनी ही पड़ेगी। उन्होंने कहा कि 'जय भीम’ शीर्षक से बनी फिल्म नाम में ही बाबासाहेब अम्बेडकर का आह्वान है।
संगोष्ठी के दूसरे दिन ऑफलाइन के साथ ऑनलाइन सत्र भी संचालित हुआ. ऑनलाइन सत्र की अध्यक्षता दिल्ली विश्वविद्यालय से डॉ. रक्षा गीता ने करते हुए कहा कि सिनेमा में डॉ. भीमराव अंबेडकर की वैचारिकता को समाहित करने में कंजूसी बरती गई. बाबा अम्बेडकर ने जिस तरह समाजवाद को, समानता को बढ़ाया उसे सिनेमा में उसी तरह का स्थान बहुत बाद में मिली. इस ऑनलाइन सत्र में कई शोधार्थियों ने अपने अपने शोध पत्र विभिन्न विषयों पर प्रस्तुत किए. संगोष्ठी संयोजक डॉ. राम भरोसे ने कहा कि साहित्य के साथ सिनेमा भी सरोकारों की बातें उठाता आया है। हालांकि यह दु:खद है कि आजादी पूर्व व उसके बाद के कुछ समय तक अम्बेडकर की विचारधारा सिनेमा में बहुत कम देखने को मिली। हालांकि आधुनिक होते हुए सिनेमा में कुछ-कुछ सरोकार के सिनेमा से जुड़े हुए दिखाई देते हैं। प्राचार्या प्रेमलता ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए संगोष्ठी संयोजक डॉ. राम भरोसे को शुभकामनाएं देते हुए विशेष धन्यवाद दिया और कहा कि भविष्य में भी महाविद्यालय में ऐसे आयोजन होते रहने चाहिए। उन्होंने कहा कि इस संगोष्ठी के माध्यम से हमारा महाविद्यालय परिवार देश के कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से जुड़ा यह गौरवान्वित महसूस कराने के लायक है संगोष्ठी के समापन सत्र के विशिष्ट अतिथि प्रो0 कल्पना पंत और प्रो० सतप्पा चव्हाण ने इस संगोष्ठी को सफल बनाने में महाविद्यालय के परिवार के आभार स्वरूप स्मृति चिह्न भेंट किए गए।
और साथ ही हिन्दी विभाग के समस्त सक्रिय वॉलेंटियर्स अमित, अजीत, पुनीत, हर्ष, मंजीत, रोहित, अभिनव, समरेज हैदर, उवैश, सन्नी कुमार, आस मोहम्मद, सावेज, भारती, काजल, महक, साक्षी, कोमल, साहिबा, शीतल, अज़ीम, सुहाना, मंतशा, नाजिया, सानिया, इकरा, इल्मा, गुलफिशा, सलोनी (अर्थशास्त्र), सलोनी (संगीत) प्रिया त्यागी, पायल मेहरा, प्राची मेहरा, शमा परवीन, फरहत, रज्जो, अलीरा का भी सम्मान किया गया।
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