कांवड़ संचालन की नई व्यवस्था से रुड़की वासियों के हाथ लगी मायूसी-छिन गया सैकड़ों का रोजगार......

dainik roorkee July 21, 2022

दैनिक रुड़की (योगराज पाल):: रूड़की। कांवड़ को लेकर प्रसाशन द्वारा बनाई गई व्यवस्था से जहां लोगों को आवागमन में मामूली राहत है तो वहीं कांवड़ के इस मेले को देख न पाने के कारण मायूसी भी बहुत ज्यादा है। इतना ही नही इस व्यवस्था के कारण स्टेट हाइवे पर जिन लोगों को करीब सप्ताह भर का अस्थाई रोजगार मिल जाता था वह अपने घरों से पैसा गंवा कर घर बैठे हैं । दो वर्षों कोरोनाकाल के बाद कांवड़ मेला इस वर्ष शुरू हुआ। 14 जुलाई से ही कांवड़ पटरी पर कांवड़ियों का रैला चल निकला। जैसा कि लोगों का मानना था कि प्रत्येक वर्ष की तरह कुछ दिन बाद कांवड़ पुराने राष्ट्रीय राजमार्ग जो कि अब स्टेट हाईवे है वहां से गुजरेगी इसके साथ ही बड़े डीजे वाली और सुंदर झांकियों वाली कांवड भी यहां से गुजरनी शुरू होंगी। इस इंतजार में 20 जुलाई तक आ गयी नगर के सैकड़ो लोग हाईवे पर बड़ी कांवड़ के इंतजार में समय बिताने लगे लेकिन जब घण्टो इंतजार के बाद कांवड़ नही आई तो जानकारी जुटाने पर पता लगा कि बड़ी कांवड़ जो कि शहरवासियों के लिए आकर्षण का केंद्र होती थी शहर से बाहर बाहर यानी नवनिर्मित राष्ट्रीय राजमार्ग (बायपास) से गुजारी जा रही है। इस खबर से न सिर्फ शहर के लोगों को मायूसी हाथ लगी है बल्कि यह भी पता लग गया कि शायद ही भविष्य में बड़ी कांवड़ अब शहर के बीच से गुजर पाए जिन्हें देखने के लिए लोगों की भीड़ हजारों की संख्या में पूरी पूरी रात हाईवे पर बैठी रहती थी। अब लोगों का कहना है कि कांवड़ देखने कोर कॉलेज या मंगलौर जाना थोड़ा मुश्किल है ऐसे में कांवड मेले की रौनक देखने की उम्मीद लिए लोगों के हाथ निराशा लगी है। वहीं स्टेट हाईवे पर लग चुके और आने वाले दिनों में लगने वाले भंडारों के आयोजक भी निराश हैं। वहीं वाईपास पर भंडारों के लिए सही स्थान और व्यवस्थाएं न होना भी परेशानी बना हुआ है। कोर के समीप स्टेट हाईवे पर भंडारे को सजाए बैठे मनोज वर्मा का कहना है कि प्रत्येक वर्ष की तरह इस वर्ष भी कांवड़ सेवा शिविर लाखों रुपये खर्च कर लगाया है लेकिन कांवड़ियों का रूट बदलने से शिविर में कांवड़िये नही पहुंच पा रहे हैं। अस्थाई रोजगार मिलता था वो भी गया... रुड़की कोर कॉलेज से लेकर मंगलौर तक करीब सैकड़ो छोटी और बड़ी चाय व खाने की अस्थाई दुकानें सजती थी जिनसे दुकानदारों को करीब पांच दिनों में खासी कमाई हो जाती थी। इस बार भी यह दुकानें लगाई तो गयी हैं लेकिन उनकी उम्मीद भी अब टूट गयी है दुकानदार अपनी दुकानों में सजे समान को लेकर बैरंग लौट गए हैं तिरपाल और लकड़ी से बनाई गई दुकानें सजने से पहले ही उजड़ गयी है।

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